आज का बच्चा फ़ोन चलाना हमसे पहले सीख लेता है — लेकिन ऑनलाइन खतरों को पहचानना उसे कोई नहीं सिखाता। रोक-टोक नहीं, समझदारी भरी सुरक्षा चाहिए। ये गाइड हर माता-पिता के काम की है।
पहले खुद नियम तय करें
बच्चे के फ़ोन पर पैरेंटल कंट्रोल चालू करें: उम्र के हिसाब से कंटेंट फ़िल्टर, ऐप डाउनलोड पर अनुमति और स्क्रीन टाइम लिमिट। नियम सबके लिए एक जैसे हों — अगर बच्चे के सामने आप खुद देर रात तक स्क्रॉल करेंगे तो नियम बेअसर होंगे। नियमों को बच्चे के साथ बैठकर तय करें ताकि उसे भी वे न्यायसंगत लगें।
खुली बातचीत सबसे बड़ा कवच
बच्चे को डराएं नहीं, समझाएं: अजनबियों से चैट न करना, अपनी फोटो-पता साझा न करना, और कुछ अजीब लगे तो तुरंत बताना। यह भरोसा दिलाएं कि कुछ गलत होने पर डांट नहीं पड़ेगी — तभी बच्चा मुसीबत में आपको बताएगा, छिपाएगा नहीं।
गेम और सोशल मीडिया पर नज़र रखें
ऑनलाइन गेम्स के चैट बॉक्स में अजनबी आसानी से घुस आते हैं — गेम की प्राइवेसी सेटिंग में चैट सिर्फ़ दोस्तों तक सीमित करें। सोशल अकाउंट प्राइवेट रखें और फॉलोअर लिस्ट समय-समय पर साथ बैठकर देखें। उम्र से पहले सोशल मीडिया अकाउंट न बनाने दें।
साइबरबुलिंग को हल्के में न लें
अगर बच्चा अचानक फ़ोन से दूर भागने लगे, चिड़चिड़ा हो या स्कूल जाने से डरे — तो धैर्य से बात करें। बुलिंग के सबूत (स्क्रीनशॉट) संभालकर रखें और ज़रूरत हो तो स्कूल या साइबर सेल से मदद लें। बच्चे को यह एहसास दिलाएं कि ग़लती करने वाले की है, उसकी नहीं।
सुरक्षा एक दिन का काम नहीं
तकनीक बदलती रहेगी, इसलिए महीने में एक बार बच्चे के साथ बैठकर उसकी ऑनलाइन दुनिया की सैर करें — नए ऐप, नए दोस्त, नई आदतें। रोक से ज़्यादा समझ काम करती है। बच्चे को नई तकनीक सिखाने में उसकी मदद लें, इससे आपका रिश्ता भी मज़बूत होगा। सही मार्गदर्शन वाला बच्चा इंटरनेट का सबसे समझदार इस्तेमाल करना सीख जाता है।